खून अपना हो या पराया। रक्त आपले असो कि दूस-याचे।
नस्ले आदम का खून है आखिर। शेवटी रक्त मानवाचेच आहे।
जंग मशरिक में हो या मगरिब में। युद्ध पूर्वेला हो या पश्चिमेला।
अम्ने आलम का खून है आखिर।। शेवटी विश्व शान्तिचाच खून आहे।।
बम घरों पर गिरे कि सरहद पर। बॉम्ब घरावर पड़ो कि सीमेवर।
रूहे तामीर जख्म़ खाती है। निर्मात्याच्या आत्म्यालाच जखम होते।
खेत अपने जले कि औरों के। शेती आपली जळो कि दूस-याची।
जस्ति फाकों से तिलमिलाती है।। जीवन भुकेलाच तळमळते।।
टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें। रणगाडे पुढे जाओ कि मागे हटो।
कोख़ धरती की बांझ होती है। धरतीचीच कूस वांझ होते।
फतह का जश्न हो कि हार का सोग। विजय आनन्द असो कि पराभव शल्य।
जिन्दगी मय्यतों पे रोती है।। जीवन मृतदेहांवरच रडते।।
जंग तो खुद ही एक मसअला है। युद्ध तर स्वतः एक समस्या आहे।
जंग क्या मसअलों का हल कर देगी। ते कोणती समस्या सोडवेल।
आग और खून आज बख्शेगी। आग अन रक्त आज ओकेल।
भूख और एहतयाज कल देगी।। भूख अन गरजा मात्र उद्या देईल।।
इसलिए ऐ शरीफ़ इन्सानों। म्हणुन हे शाहण्या, चांगल्या माणसांनों।
जंग टलती रहे तो बेहतर है। युद्ध टळले तर चांगले होईल।
आप और हम सभी के आंगन में। तुमख्या-आमच्या-सर्वांच्या अंगणात।
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है।। दिवे लागतील तर बरे होईल।।
-साहिर लु़धियानवी (अनु़वाद- प्रदीप निफाडकर) ...साभार लोकमत 30/9/2010
नस्ले आदम का खून है आखिर। शेवटी रक्त मानवाचेच आहे।
जंग मशरिक में हो या मगरिब में। युद्ध पूर्वेला हो या पश्चिमेला।
अम्ने आलम का खून है आखिर।। शेवटी विश्व शान्तिचाच खून आहे।।
बम घरों पर गिरे कि सरहद पर। बॉम्ब घरावर पड़ो कि सीमेवर।
रूहे तामीर जख्म़ खाती है। निर्मात्याच्या आत्म्यालाच जखम होते।
खेत अपने जले कि औरों के। शेती आपली जळो कि दूस-याची।
जस्ति फाकों से तिलमिलाती है।। जीवन भुकेलाच तळमळते।।
टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें। रणगाडे पुढे जाओ कि मागे हटो।
कोख़ धरती की बांझ होती है। धरतीचीच कूस वांझ होते।
फतह का जश्न हो कि हार का सोग। विजय आनन्द असो कि पराभव शल्य।
जिन्दगी मय्यतों पे रोती है।। जीवन मृतदेहांवरच रडते।।
जंग तो खुद ही एक मसअला है। युद्ध तर स्वतः एक समस्या आहे।
जंग क्या मसअलों का हल कर देगी। ते कोणती समस्या सोडवेल।
आग और खून आज बख्शेगी। आग अन रक्त आज ओकेल।
भूख और एहतयाज कल देगी।। भूख अन गरजा मात्र उद्या देईल।।
इसलिए ऐ शरीफ़ इन्सानों। म्हणुन हे शाहण्या, चांगल्या माणसांनों।
जंग टलती रहे तो बेहतर है। युद्ध टळले तर चांगले होईल।
आप और हम सभी के आंगन में। तुमख्या-आमच्या-सर्वांच्या अंगणात।
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है।। दिवे लागतील तर बरे होईल।।
-साहिर लु़धियानवी (अनु़वाद- प्रदीप निफाडकर) ...साभार लोकमत 30/9/2010
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